Wednesday, 7 March 2018

नज़रिया

आओ,
मेरी कलम के लिखे लफ़्जों को ज़रा महसूस करके भी देखो
पिरोया जिन जज़्बातों को मैंने कविता के हार में,
उन्हें मोतियों से ज़रा और ज़िंदा मानकर भी देखो
देखो,
किस नज़ाकत से बटोर लिया मैंने अश्कों को
और घोलकर स्याही में, काग़ज़ पर करीने से बिखेर दिया
जो कुछ फी़का पड़ गया रंग स्याही का,
तो काग़ज़ को रूसवा मानकर भी देखो..
समझो, न समझो तुम मेरी दिवानगी इस रात के लिए
मेरे कहने से एक बार इसे कुछ गुफ़्तगू करने देकर भी देखो
कुछ कहो, कुछ सुनो,
कुछ खुद में शामिल होने देकर भी देखो
है हयात यह भीनी रंज़िश मेरे वास्ते,
तुम इसमें एक लम्हा तो गुज़ार कर देखो
कहती है दुनिया शायर मुझे,
आओ,
मुझे एक दफ़ा औरों सा भी मानकर देखो..

Sunday, 18 February 2018

विरोधाभास

काल्पनिकता और वास्तविकता, एक कवि के विडंबना-पूर्ण जीवन की सर्वथा विपरीत, परन्तु सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण इकाईयां हैं। एक पल में कवि अपनी वास्तविकता के धरातल से कहीं ऊपर पहुँच किसी मोहक काल्पनिक आकाश में पेंचे लड़ाने लगता है, पर तभी कोई क्षितिज से ठठाकर हँस पड़ता है - "चाहे कितना ही विस्तृत हो ये आकाश, है तो मिथ्या ही!"....और कवि लौट आता है वास्तविकता के धरातल पर, अपनी आहत मनोदशा को शब्दों में उतारने, और शब्दों को बांधते-बांधते फिर से क्षणभंगुर काल्पनिकता को अपने विचारों का अमृत पिलाने।

कवित्व का अभिशाप, और हः! ऐसा उपहास!

कवि भी क्या करे? यह संसार भले ही उसे क्षुब्धः कर देता हो, पर है तो वहीं, उसकी नज़रों के आगे बिखरा पड़ा यर्थाथ! सत्य भले ही हलाहल हाथ में ले स्वागत को खड़ा हो, उससे विमुख होना संभव नहीं है। परन्तु मिथ्या में वह लोच नहीं! मिथ्या पूर्ण नहीं है, पूर्ण मान लेने का सुख है। कवि के लिए मिथ्या अमृत नहीं, संजीवनी है.....

और जो कवि होकर रह लिया, उसका अमृत से क्या प्रयोजन?
परन्तु है तो वह कवि ही, भौतिक ही, मानव ही....

वह काल्पनिकता, यह वास्तविकता, हे ईश्वर, यह कैसी मृग-मरीचिका है जिसकी चिर तृष्णा तूने मुझे दी है?

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